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मीडिया के धत्तकर्म की प्रयोगशाला -जेएनयू

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Photo: Sunaina, The Informer

जेएनयू हम विस्थापित छात्रों के लिए अकादमिक स्थल से ज्यादा घूमने की जगह रही है, जहाँ हमने पूर्वांचल से लेकर गंगा, शम्भू के माछी-भात से लेकर ट्वेंटी फॉर इंटू सेवन (24*7) तक को चखा है. यहाँ के  ढ़ाबों का किफायती होना, पर्चा-पोस्टर संस्कृति और जीवंत राजनीतिक माहौल हमें आकर्षित करता है. देश-विदेश की राजनीति में दोहरेपन से कुंठित, कई दफ़े ‘पॉलिटिक्स इज़ बैड’, ‘सब एक जैसे हैं’ कहकर चर्चाओं को अक्सर हम खारिज करते रहे हैं, वहीँ जेएनयू हमारे लिए राजनीति समझने की प्राथमिक प्रयोगशाला बनी.

हाशिये पर खड़े लोगों की कहीं तो बात होती है, कोई तो एक जगह है जहाँ सामाजिक न्याय के प्रति युवाओं में प्रतिबद्धता दिखती है- इस तरह का एहसास हमें आशावान बनाये रखता है. छात्र राजनीति की भविष्य में संभावनायें बची हैं, यह सोच मुझे अंदर से खुशी दिया करती. रोहित वेमुला का मुद्दा और जेएनयू में नौ फरवरी की घटना के बाद कन्हैया का राष्ट्रीय पटल पर छा जाना; थोड़े देर के लिए सही, यूटोपियन कल्पना में ले जाता है. सोचकर गदगद होते हैं- काश, हमारे नेता यहाँ के छात्र नेताओं की तरह मुद्दों पर बात किया करते, घर की दिवारों पर गंजी-बनियान के पैम्फलेट के बजाय रमाशंकर विद्रोही की कविताएं, बाबा साहेब की बातें चिपकायीं जाती. इससे होता यह कि दक्षिणपंथ और वामपंथ के नाम पर जो नफरत और मार-काट बाहर व्याप्त है उस पर थोड़ा लगाम लग पाता. इससे एक बेहतर और जागरूक नागरिक समाज के निर्माण में सहयोग होता.

इन सब्जबाग के बीच, जब हाल ही में ‘जेएनयू हॉस्टल में बलात्कार’ की खबरें बाहर मीडिया में आई, हमें बहुत दुख हुआ. हालांकि, यह पहली घटना नहीं थी लेकिन हमारी प्रगाढ़ दोस्ती जेएनयू से नई और पहले से ज्यादा औपचारिक थी. जिस कैंपस में महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता, सशक्तिकरण, स्वावलंबन जैसे विषयों पर गंभीर बहस होती है, पंडिता रामाबाई से लेकर मैरी जॉन तक को पढ़ा जा रहा हो, पोस्टर्स पर बड़े-बड़े कथन लिखे जा रहे हो वहाँ यह वीभत्स घटना  कैसे? क्यों? बाहर और भीतर फिर अंतर ही क्या है? हैरत की बात और, जबकि आरोपी प्रगतिशील और सक्रिय छात्र नेता बताया जा रहा हो. ये तो हिप्पोक्रेसी है!

इफ्तेफ़ाक से इस घटना के तीन-चार दिन बाद हमारा जेएनयू जाना हुआ. उस रात छात्रसंघ की ओर से यूनिवर्सिटी जेनरल बॉडी मीटिंग (यूजीबीएम) बुलाई गई थी. आगामी चुनाव लिंग्दोह या जेएनयू छात्रसंघ के संविधान से कराये जाए, इस पर बहस होनी थी. लेकिन, पूरी रात शायद ही कोई वक्ता रहा हो जिसने आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन) को फटकार ना लगाई हो. इसके पहले यह बताना भी जरूरी है कि आइसा ने आरोपी को संगठन से बाहर कर जाँच और गिरफ्तारी की माँग की. पूरे कार्यक्रम को गौर से देखने-सुनने से यह स्पष्ट था कि वाम संगठनों की यहाँ से बेहतर और कटु आलोचना बाहर नहीं की जाती. खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तरह तो कतई नहीं जो वाम को गलत साबित करने की आड़ में दक्षिणपंथ को दबी जुबां में सही ठहराने की अथक कोशिश में लग जाते हैं.

जेएनयू को लेकर  मीडिया के हवाले जो पब्लिक ऑपिनियन और प्रौपगैंडा फैलाने का धत्तकर्म चल रहा है, इसमें जरूरी बन जाता है कि कैंपस के भीतर क्या चर्चा है यह लोगों को बताई जाए. टीवी में जेएनयू के लिबरल स्पेस को खत्म करने या बंद करने वगैरह की बेजा बहस से कहीं ऊपर लैंगिक समानता कैसे सुनिश्चित की जाए? वाम दलों में कॉमरेड का चयन कैसे हो ताकि ऐसी घटनाएं दुबारा ना हो, सिद्धांत और यथार्थ का फर्क़ कैसे खत्म हो? इस पर चर्चा केंद्रित रही. उसी मीटिंग में मुझे यह पता चला कि जेएनयू ही एकमात्र ऐसा शिक्षण संस्थान है जहाँ ‘जीएसकैश’ जैसी संस्था, जो ऐतिहासिक विशाखा फैसले- कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम के लिए बने कानून से संबंधित है, कार्यरत है. और सबसे जरूरी बात शिकायतकर्ता के लिए ‘पीड़िता‘, ‘बेचारी‘, ‘लाचारी‘ जैसे शब्दों का प्रयोग न किया जाए, यह भी एक शिकायतकर्ता की तरफ से अनुरोध आया. ये तो हमें भी सीखने की जरूरत है कि हम संवेदनशील होने की प्रक्रिया में कहीं विक्टिमाईजेशन का विस्तार तो नहीं कर रहे?

जरूरी यह भी है कि हम मीडिया के हवाले किसी विषय-वस्तु के प्रति धारणाग्रस्त होने से बचें. तथ्यों का तर्कपूर्ण आकलन और थोड़ा शोधपरक होना हमें और समाज को बेहतर कर सकता है.

रोहिण कुमार आईआईएमसी में हिंदी पत्रकारिता के छात्र है.

 

 

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